दलित आत्मकथाओं में अभिव्यक्त दलितों का जीवन-संघर्ष

Authors

  • डॉ. नंदराम असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, का. सु. साकेत स्नातकोत्तर महाविद्यालय,अयोध्या। Author

Keywords:

दलित, दलित-जीवन, दलित जीवन-संघर्ष, सामाजिक भेदभाव, छुआछूत, उत्पीडन

Abstract

दलित आत्मकथाएं दलितों के जीवन संघर्ष का जीवंत दस्तावेज हैं। हिंदी दलित साहित्य में कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि विधाओं की तुलना में आत्मकथाओं को अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है। दलित आत्मकथाओं में दलितों द्वारा 'भोगा हुआ यथार्थ ' अत्यंत मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त होता है। इसमें दलितों के दमन, वंचन, उत्पीड़न, त्रासदी आदि का जीवंत चित्रण प्राप्त होता है। डॉ. श्योराज सिंह बेचैन ने लिखा है- "दलित आत्मकथाओं में दलित छवि एक सचेतन आत्म-संघर्षरत स्वाभिमानी व्यक्ति की छवि के रूप में उभरकर सामने आई है। दलित आत्म कथाकार अतीत की भद्दी तस्वीरें देखते हैं । साथ-साथ उन हाथों को भी पकड़ते हैं जिन्होंने कई सौंदर्य से भरी जीवन-झांकियों पर ईर्ष्यावश कालिख पोत दी है। इतिहास विहीन समाज में ये आत्मकथाएं सूचनाओं, तथ्यों और स्थितियों के ऐसे प्रमाण जुटाती हैं जिनके बगैर हिंदी समाज का अध्ययन अधूरा है। "1

दलित आत्मकथाएं मानवीय समता, सामाजिक न्याय, स्वतंत्रता, समरसता तथा सामुदायिक बंधुता की भावना को प्रेरित करते हुए सामाजिक यथार्थ को सजीवता एवं संजीदगी के साथ अभिव्यक्त करने का प्रयास करती है। दलित आत्मकथा लेखन की परंपरा का प्रारंभ स्वतंत्रता के उपरांत सबसे पहले मराठी भाषा में हुआ। हिंदी भाषा में दलित आत्मकथा लेखन की शुरुआत नब्बे के दशक से हुई। दलित आत्मकथाओं में मोहनदास नैमिशराय की 'अपने-अपने पिंजरे' (तीन-भाग), ओमप्रकाश वाल्मीकि की 'जूठन ' (दो-भाग), भगवान दास की 'मैं भंगी हूं ' , डॉ. डी .आर. जाटव की 'मेरा सफर मेरी मंजिल', पूर्व राज्यपाल माता प्रसाद की 'झोपड़ी से राजभवन', रूप नारायण सोनकर की 'नागफनी', कौशल्या बैसंत्री की 'दोहरा अभिशाप', सुशीला टाकभौरे की 'शिकंजे का दर्द', श्योराज सिंह बेचैन की 'मेरा बचपन मेरे कंधों पर', तुलसीराम की 'मुर्दहिया' और 'मणिकर्णिका' के साथ-साथ सूरजपाल चौहान की 'तिरस्कृत' और 'संतप्त' आदि विशिष्ट हैं। इन आत्मकथाओं की आत्माभिव्यक्ति में इन लेखकों का कौशल कुछ अलग-सा है, किंतु संवेदनात्मक लगाव एक-सा है, इनका घर, बस्तियां, स्कूल-कॉलेज, समाज, सवर्णों से संघर्ष, स्त्रियों का शोषण, जातिगत उत्पीड़न, आर्थिक संकट और उनके समूचे मानवीय अस्तित्व पर उठे गंभीर प्रश्न उनकी चिंता एवं चिंतन के विषय रहे हैं। यही वजह है कि करुणा, सहानुभूति की संवेदनशीलता उन्हें पढ़ते समय प्रत्येक पाठक में अपने आप सहज निर्मित होती है । गुलामी की जंजीरों को तोड़ने का उपक्रम ही उनके साहित्य सृजन का मूल उद्देश्य है, किंतु यह सुखद नहीं बेहद दुखद यात्रा है।

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Published

2026-07-25

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Articles